नारी


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सांझे  सांझे  चलती   है ,

आँखों  से  ही  कहती  है  ……

दुआ  में  जिसके  बसे  हैं  सपने ,
हर  किसी  को  वो  समझे  अपने ….
कल  जो  बीत   गया  ….एक  दुल्हान  ऐसी   होती  थी …. एक  नारी  ऐसी  होती  थी  ….
 
मिट्टी  हो  या  सोना ,
 उसे  पता   है  उम्मीद को  नहीं है खोना …..
कई  रूप  में  बसे  हैं  उसके  प्राण ,
माँ  का  आँचल  हो  या  बेटी  का  प्यार  ….
वो   ही  है  सृष्टी  वो ही  है   शक्ति ,
वो  ही  संपूर्ण  है ….वो   ही  देहलीज  की  लाज  है  ….. वो  ही  आराध्या  है  ….
 
कभी  ग़म  को  ना  बताये ,
कभी  दुःख  को  ना  जताए ….
एक  आस  और  एक  एहसास ,
वो  ही   दुल्हान   है ,
वो  ही  नारी  है  …..
 
आज  वक़्त   बदल  रहा  है ,
अबला  सबला  बन  गयी  है …
आधुनिक  नारी  है  वो  सब  जानती  है  ….. सब  सुनती  है ….और  सब   कहती  भी  है ….
 
 जिसकी  बातें  और  सीरत दोनों  खूबसूरत  है …. वो  ही  स्वप्न  सुंदरी होती  है ….वो  ही   आधुनिक  नारी  है  ….
 
हक  के  लिए  जागरूक  हैं  ,
शिक्षा  ने  बनाया  है  सबल ….
पर  यह  अस्तित्व  है  नारी  का …. प्रतिबिम्ब   देखो  जिसका  उसकी  आँखों  से ….. यह   नारी  कहती  है …. यह  ही  दुल्हान कहती  है  !!!!!!
 
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5 thoughts on “नारी

    1. Oh! Thanks Ashish for your encouraging words, I think this poem is 3 years old…I just wrote it & shared, I was exploring blogging world, hardly knew anything about blog, blog post that time 😀
      Thanks so much for visiting…Keep writing*keep Inspiring

      Liked by 1 person

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