रफ़्ता रफ़्ता रफ़्तार …..!!!!!


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नारी से घर है , संसार है, समाज है, श्रृष्टि है,नारी शक्ति है,नारी के रूप अनेक है …….!!!!!
बदलते समय के साथ नारी का स्वरुप, दायरा परिवर्तित हो रहा है तो घर, संसार और समाज भला इस परिवर्तन से अछूता कैसे रहेगा ?
सरपट ऑफिस का बोझ और झटपट घर का काम काज संभालती हुई नारी अग्रसर समाज का पूरक बन चुकी है ….व्यवस्थित जीवन प्रणाली (मोबाइल फ़ोन की organizer) और तंत्र व्यवस्था (Networking) नारी की बदलती परिस्थति , मनोवृति और पहचान का परिचायक हैं ….नारी सशक्तिकरण के जादू से अछूती शायद ही कोई नारी होगी चाहे वोह अनपढ़ हो या फिर पढ़ी लिखी …..कुछ देर के लिए अगर हम  नारी अवरोधक विचारधारा और नारी शोषण से जुड़े मुद्दे भूल जाते है तो नारी सशक्तिकरण का ग्राफ भला चंगा ही लगेगा…..

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संचार क्रांति के दौर में जहाँ बटन  दबा कर सारे काम काज चुटकी में हो जाते हैं वहां शायद रिश्तो का अपनापन भी बटन तक सिमट गया है
बचपन से हम लडकियां अपने राजकुमार को परियों और रानियों की रुपहली दुनिया में ढूँढती हैं और शादी के बाद ये ही सपनो की दुनिया रुपहली से यथार्थ में बदल जाती हैं और हमें ताउम्र अपनी जिम्मेदारियों का दायरा विकसित करना पड़ता है हर एक रिश्ता निभाने के लिए…
पहले वक़्त कुछ और था समां कुछ और था… दायरे  छोटे थे… आजीविका के साधान की जिम्मेदारी ज्यादातर पुरुष तक ही सिमित थी.. और नारी के जिम्मेदारी का खांचा घर बार और रसोई घर तक ही सिमित था… आज समय बदल गया है… नारी घर- संसार  दोनों संभालती हैं और पुरुष को आर्थिक सहायता भी करने में सक्षम हैं …..इस बदलाव की जरूरत मंहगाई , जरूरतों के साधन की मजबूरी और जीवनयापन विधि ( Life style improvement ) जैसे कारक जिम्मेदार हैं….इन्हें जितने भी नाम दे दिए जाए कम ही पड़ेंगे ….

संयुक्त परिवार (Joint family) के खांचे से निकल कर आज हम मूल परिवार (Nuclear Family) की ओर सन्मुख हो गए है और हमारा बचपन आँगन से निकल कर बालकोनी तक सिमित हो गया है…..
बच्चे आज टीवी , लैपटॉप, play station और मोबाइल फ़ोन चालाते हैं…. imagination की जगह अब fascination आ गया हैं जिंदगी में …..सब चल रहा है बस यूँ ही ….. और हम भी चल रहे है बस यूँ ही खिचे हुए से …..आजीविका के संसाधन और साधन जुटाने के लिए सुबह से शाम तक बस मशीन की तरह काम करते हैं और जीवन शैली बस यंत्रवत ( Robot)  हो गयी है ….
इसी बात पर एक पुराना नगमा याद आ गया  ” थोडा हैं थोड़े की जरूरत हैं जिंदगी फिर भी यहाँ खूबसूरत हैं “…..पर शायद बदले परिवेश में ” money हैं तो  honey हैं”…..

  पुरानी परंपरा और पारस्परिक रिश्तो का जोड़ आपसी समझ और संस्कारो की नीव पर रखा जाता था जिसमें से शादी को सामाजिक मान्यता और अटूट बंधन की संज्ञा मिली हुई थी…. आज arranged/ Love marriage जैसे लफ्ज़ पुराने outdated हो गए हैं और इनकी जगह Contract marriage और Living In relationshipजैसे लफ्ज़ सुनने को मिल जाते हैं ….Mr. या Mrs. XXXXX जैसे शब्दों को बोलने से पहले आज शायद सोचना पडता हैं की अमुक जोड़ा वह्वाहिक दम्पति हैं भी या नहीं ?गैर अचंभित बात यह भी हैं की मुश्किले भी इस उन्नत और उन्मुक्त सोच की देन है….. मिसाल की तौर पर Divorce Rates में बढोतरी ,आपसी जुडाव और मानसिक असामनता जैसे शब्दों में पति और पत्नी अपनी रिस्तो की मिठास भूलते जा रहे हैं ….

“हम” / “हमारा”… आपसी रिश्तो का जुडाव और प्यार मै…अब ” मैं”/ ” मेरा” में तब्दील हो चुका है …. और singular identity में विलुप्त हो गया है…. अहम् हावी हैं stressful  lifestyle ,freedom ,space सब चहिये एक घर में रह कर आज लोग SMS, Intercom  में बात करते हैं पडोसी के घर जाने के लिए आज appointment लेना पड़ता है schedule मिलाना पड़ता है उसके साथ …..
” busy with my business attitude” के चलते जहाँ एक और माँ बाप कभी बच्चो की परवरिश में जान लगते थे… अरमान देखते थे… आज के MoM और Dad ….Nanny औरLuxuryLifestyle  के जरिये बच्चो से मिलते हैं ….अपवाद हर  जगह होते हैं यहाँ पर भी होंगे पर परवारिश और संस्कार परिवार की पहचान जी है…. वो पहचान वक़्त और जिंदगी की भागम- भाग में रफ्ता रफ्ता धूमिल होती जा रही है…..

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लोग पहले पत्र चिट्ठी लिखते थे आज Social Networking Sites के जरिये और Video Chatting ,emails… के जरिये हम आपस में रूबरू होते हैं …..परस्परता और जुडाव खत्म हो रहा है इस भागम- भाग में ….
समय तेज गति से बदलाव ला रहा है…. सोचने समझने के तौर तरीको में और सामाजिक बन्धनों में और आगे भी अपने परिवर्तनशील
रूप में काबिज़ रहेगा और हमारा सामाजिक खांचा …. इसी के अनुरूप अपने आप को संवारता  रहेगा ….

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